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घोर उपेक्षा का शिकार है यह रेलवे स्टेशन

गंजमुरादाबाद/उन्नाव। गंज मुरादाबाद रेलवे स्टेशन कानपुर तथा  बांगरमऊ  रेलवे स्टेशन  के
मध्य  पड़ने वाला एक महत्वपूर्ण  रेलवे स्टेशन है  जो आज  अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाता नजर आ
रहा है। मुरादाबाद रेलवे मंडल  के अंतर्गत आने वाले रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की खासी भीड़ रहती है। इसके बावजूद भी अब तक रेलवे अंग्रेजों के समय से चली आ रही ट्रेनों की संख्या बढ़ाने में जहमत नहीं कर पाया है। रेलवे स्टेशन पर आजादी के करीब 71 साल गुजर जाने के बावजूद अब तक Platform तक नहीं बन सका है, और न ही बरसात व  गर्मी के दिनों में यात्रियों के ठहरने  के लिए प्लेटफॉर्म पर छाया ही मुनासिब हो पाई है। कहने को तो रेलवे यहां पर मजबूरी में स्टॉप रखता है। गंज मुरादाबाद रेलवे स्टेशन से बालामऊ कानपुर पैसेंजर तथा कानपुर से सीतापुर पैसेंजर सुबह और शाम गुजरती है। यह पैसेंजर अंग्रेजी शासन काल में शुरू की गई थी जिनमें सीतापुर पैसेंजर कानपुर के छावनी एरिया को सीतापुर के छावनी एरिया से जोड़ने के लिए सुरक्षा की दृष्टि से चलाई गई थी, जो अनवरत चल रही है। वही कानपुर से बालामऊ प्रदेश के पिछवाड़े समझे जाने वाले लखनऊ हरदोई रूट को लिंक करती है, से जोड़ा गया । इसके अलावा कानपुर से सीधे सांडी जिला हरदोई को भी एक रूट की स्थापना की गई थी।
आजादी के बाद देश को आजादी की पट्टी पढ़ाने वाले जिम्मेदारों ने रूट को आगे बढ़ाने की बजाय तोड़ने में देश का विकास नजर आया। अब इस ट्रक पर रेलवे लाइन भी नहीं दिखाई पड़ती। देश के उपराष्ट्रपति को समर्पित एक ट्रेन जिसे हमीदा के नाम से भी जाना जाता था। ओछी राजनैतिक दृष्टिकोण के चलते बंद कर ट्रेन  दूसरी जगह भेज दी गई। किसी भी क्षेत्र की आर्थिक सामाजिक पहलुओं को सबसे ज्यादा कर प्रभावित करता है तो वह है रेलवे।
रेलवे वहां की आर्थिक मजबूती को सबल करता है। वहां के उत्पाद को बड़े बाजार में पहुंचाने का एक सरल व मजबूत माध्यम भी बनता है। यह सब जानने के बाद भी क्षेत्र के विधायकों और सांसद ने सिर्फ अपने निजी हितों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्र के विकास के लिए कोई विशेष कार्य अब तक नहीं किया है। जिसके चलते ग्रामीण अंचलों में आर्थिक दृष्टि से किसी प्रकार की आधारशिला अब तक नहीं रखी जा सकी है।
विशेष रिपोर्ट: आलोक

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