सस्पेंस खत्म, दागीं मिसाइलें
डेस्क। सीरिया में बीते सप्ताह हुए कथित
रासायनिक हमले के बाद अमेरिका के अगले कदम को लेकर सस्पेंस अब खत्म हो गया है। उसने
मध्य-पूर्व के इस देश में कई जगह मिसाइलें दागीं, जिसके बाद
दुनिया में एक अलग किस्म का तनाव और चुप्पी नजर आ रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति
डोनाल्ड ट्रंप ने सीरिया को समर्थन दे रहे रूस को पहले की चेतावनी देते हुए कहा
था कि 'उम्दा, उन्नत और स्मार्ट' किस्म की मिसाइलें दागी जाएंगी। रूस ने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए
कहा था कि इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे। अब जबकि अमेरिकी मिसाइलें सीरियाई शहरों
तक पहुंच चुकी हैं, अमेरिका और रूस के बीच एक नए तरह का तनाव नजर आ रहा है, जिसकी चपेट
में पूरी दुनिया है और भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता। संयुक्त राष्ट्र पहले
ही कह चुका है कि यह 'शीत युद्ध' की वापसी जैसा है। तो 'शीत युद्ध' के इस दौर में क्या होगी भारत की भूमिका?
दिल्ली के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय (JNU) में अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर
चिंतामणि महापात्र बताते हैं, 'भारत के लिए दुविधा की स्थिति है। उसके
अमेरिका के साथ-साथ रूस से भी अच्छे संबंध रहे हैं और में वह खुलकर किसी के खिलाफ
या साथ जाने की स्थति में नहीं है।' यही वजह है
कि भारत की ओर से अब तक इस मसले पर बस संबंधित पक्षों से शांति बरतने की अपील की
है। हालांकि बीते दिनों प्रधानमंत्री मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन
की फोन पर लंबी बातचीत भी हुई थी, जिसके बाद इन अटकलों को बल मिला था कि
भारत अंतर्राष्ट्रीय महत्व के इस मसले पर चुप नहीं नहीं बैठेगा। भारत पहले ही कह
चुका है कि वह किसी भी तरह के रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के खिलाफ है। लेकिन
क्या सीरिया में सचमुच रासायनिक हमला हुआ है? आखिर कौन इस
बारे में तय कर सकता है?
प्रोफेसर
महापात्र बताते हैं, 'एक इंडिपेंडेंट इन्वायरी ही यह तय कर सकती है कि रासायिक हथियारों के इस्तेमाल
को लेकर सच्चाई क्या है, जो फिलहाल नहीं है। यही वह है कि सभी इस बारे में अपनी-अपनी थ्योरी दे रहे
हैं। जहां अमेरिका सीरिया में विद्रोही बहुल डूमा इलाके में असद सरकार द्वारा
रासायनिक हथियारों से हमले की बात कर रहा है, वहीं सीरिया
ने ऐसे किसी भी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। रूस भी उसके साथ है। रूस का तो
यहां तक कहना है कि इसकी साजिश के पीछे ब्रिटेन का हाथ है।' यहां इस बात
का उल्लेख प्रासंगिक होगा कि अमेरिका ने इससे पहले इराक पर भी हमला वहां 'व्यापक
विनाश' के हथियारों की मौजूदगी का हवाला देते हुए ही किया था, जबकि बाद
में कई जांचों में इन आरोपों को निराधार पाया गया था।
बहरहाल, मौजूदा मोदी
सरकार के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भारत की धमक और प्रभाव
बढ़ने के बाद भी ऐसे संवेदनशील मसले पर भारत की चुप्पी क्या कहती है? प्रोफेसर
महापात्र कहते हैं, 'मौजूदा समय में दुनिया के सभी देशों का रवैया 'इश्यू-स्पेसिफिक' मुद्दे पर
अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देने की हो गई है। यानी यह मुद्दे के ऊपर निर्भर करता
है कि कौन सा देश कौन सा पोजिशन लेता है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर भारत, चीन के साथ
हो सकता है और चीन इस मुद्दे पर पूरी तरह रूस के साथ जाएगा।' तो क्या एक
बार फिर दुनिया में गुटबाजी शुरू होने के आसार हैं, जैसा कि इस
मुद्दे पर दुनिया के ताकतवर देश दो धड़ों में बंटते नजर आ रहे हैं। एक ओर जहां रूस, ईरान और
सीरिया साथ नजर आ रहे हैं। वहीं ब्रिटेन, फ्रांस के
साथ-साथ जर्मनी, इजरायल, कनाडा, तुर्की और यूरोपीय संघ भी इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ हैं।
ऐसी स्थिति
में भारत की क्या भूमिका हो सकती है? वह किस ओर
खड़ा होगा? क्या एक बार फिर भारत की पुरानी 'गुटनिरपेक्षता' की नीति
प्रासांगिक हो गई है, जिसे लेकर विगत दिनों में सवाल उठते रहे हैं। मौजूदा समय में पश्चिमी देशों, खासकर
अमेरिका के साथ करीबी संबंधों और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के बढ़ते दबदबे को
देखते हुए हमारे लिए यह कितना सहज हो पाएगा? प्रोफेसर
महापात्र बताते हैं, 'भारत मौजूदा समय में रूस, चीन और अमेरिका, तीनों देशों
के साथ दोस्ती चाहता है। फिर, भारत और अमेरिका की 'स्ट्रैटिजिक
पार्टनरशिप' में डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में काफी उतार-चढ़ाव देखेने को मिल रहा है।
उसने अभी 'करंसी पॉलिसी' को लेकर भारत को एक वाचलिस्ट में रखा है। ऐसे में भारत को एक नए किस्म का 'नॉन-अलाइनमेंट' पोजिशन लेना
पड़ेगा।'
बहरहाल, सीरिया में
मानवाधिकारों का उल्लंघन एक अहम मुद्दा है। एक अनुमान के मुताबिक, सीरिया में
पिछले करीब सात-आठ साल से जारी गृहयुद्ध में 50 लाख लोगों
की जान जा चुकी है। करीबी आधी आबादी का पलायन हो चुका है। साफ है कि राष्ट्रपति
बशर अल-असद की सरकार मानवाधिकारों की रक्षा नहीं कर सकी। पिछले दिनों सीरिया के
डूमा शहर में हुए कथित रासायनिक हमलों में 40 से अधिक
लोगों के मारे जाने की बात सामने आई। जबकि
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 500 से अधिक लोगों में रासायनिक संक्रमण के लक्षण
पाए गए। निश्चित रूप से मानवता के लिए यह स्थिति भयावह है, जिस पर पूरी
दुनिया को असद सरकार से सवाल करना ही चाहिए। लेकिन भारत कभी किसी देश की सत्ता को
बाहरी दखल द्वारा बदले जाने के पक्ष में नहीं रहा है और इसलिए व्यावहारिकता के
आधार पर सभी पक्षों से बेहतर संबंध रखते हुए संयुक्त राष्ट्र के जरिये ऐसे मसलों
के समाधान के पक्ष में है। उसने पिछले दिनों भी कहा था कि रासायनिक हमले से जुड़े
मुद्दे का समाधान रासायनिक हथियार संधि के प्रावधानों के तहत किया जाना चाहिए।'

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