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घोर उपेक्षा का शिकार बालामऊ उन्नाव रेलवे ट्रेक

उन्नाव। ब्रिटिश हुकूमत के समय बालामऊ सिंगल रेलवे  ट्रेक की शुरूआत तो की गई परन्तु आजादी के बाद घोर उपेक्षा के शिकार होते गए इस क्षेत्र में न तो नई गाड़ियों की बढ़त हुई और न ही स्टेशनों का सौंदर्यीकरण ही हो सका। इस ट्रेक पर यदि महत्वपूर्ण स्टेशनों की बात की जाए तो जोगीकोट, अटवा, गंजमुरादाबाद, बॉगरमऊ, सफीपुर, उगू, चकलवशीं, मेथीटीकुर, नरहरपुर, माखी आदि का नाम प्रमुखता से आता है। जिनमें एक बालामऊ से कानपुर सुबह चलती है। जो कि शाम को साढ़े तीन बजे चलकर रात्रि में पहुॅच जाती है। इसके अलावा दूसरी ट्रेन सीतापुर से चलकर शाम को कानुपर पहुॅचती है। वही गाड़ी सुबह चलकर दोपहर के आसपास सीतापुर बालामऊ ट्रेक से होकर जाती है। इस प्रकार से अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि अग्रेंजो से समय हरदोई के साण्डी तक विस्तार पा चुके इस ट्रेक में गाड़ी तो नहीं बढ़ी हां साण्डी(जिला हरदोई) की बन्द रेलवे लाइन चोरों की भेट जरूर चढ़ गई। 
बन्द पड़ी रेलवे लाइन के अवशेष आज भी फरहतनगर रेलवे क्रांसिग के आसपास साफ देखी जा सकती है। बात करे तो अक्सर लेट लतीफ रहने वाली सिंगल गाड़ी से दैनिक यात्रा करने वालो की संख्या वर्तमान समय पॉच हजार तक छू रही है। इसके बावजूद स्टेशनां पर न तो यात्रियों के बैठने का कोई इंतजाम ही बन पाया है। और न ही सिर छिपाने के लिए कोई छाया। यहॉ अक्सर प्यास से जूझते मुसाफिर ट्रेन के इंतजार मे घण्टों खड़े दिखाई देते हैं। इस ट्रेक के अधिकांशतया रेलवे स्टेशनों में पेयजल का भी समुचित इंतजाम नहीं है। यदि है भी तो यात्रियों की पहुंच से इतने दूर कि प्यास बुझाने के फेर में कानपुर या बालामऊ जाने वाली एक फेरा लगाने वाली ट्रेन भी छूट जाए। इतना ही नहीं ट्रेन यदि देर रात को आए तो यात्रियों के लिए प्लेटफार्म के बाहर तक सन्नाटे व अधेंरे में डूबे इन स्टेशनों मे चहलकदमी की हिम्मत कर पाना बेहद कठिन होता है। रेल प्रशासन से स्थानीय यात्रियों ने उक्त विषय को लेकर कई बार शिकायते की इसके बावजूद भी किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं मिल सकी है। यदि रेलवे से कोई शिकायती पत्र देता है तो रेलवे घाटे मे चल रहे ट्रेक का हवाला देकर अपनी इतिश्री कर लेता है। काफी मुस्किल से पूर्व मे डीआरएम बालामऊ रेलवे ट्रेक का निरीक्षण हुआ था जिसके दौरान उन्होने स्थानीय यात्रियो को आश्वासन भी दिया था। परन्तु वह सब आश्वासन अब तक कोरा ही साबित हुआ। यदि दैनिक यात्रियों का आकंलन ही किया जाए तो प्रत्येक स्टेशन से हजारों की आय हो जाने के बाद भी रेलवे किस प्रकार के घाटे की बात करता फिर रहा है। इस पर क्षेत्रवासी खाशे आक्रोश में है। भूसे की तरह भरकर कानपुर जाती ट्रेन मे कई बार बोगियो की संख्या भी बढ़ाने की बात भी रखी गई तो उन्होने यात्रियों की कमी होना बताया। जबकि उनके सामने से भूसे से भरी गाड़ी निकलती है। यदि रेलवे स्टेशनों की स्थितियों का आकलन किया जाए तो आजादी के बाद इन स्टेशनो  पर इक्का दुक्का ही विकास दिखता है। वह भी आधा अधूरा कही बरसात में यात्रियों को भीगने से बचाने के लिए सेड ही नहीं तो कहीं यदि सेड है तो मात्र बीस तीस लोगों के लायक जबकि वहॉ नगर पालिका तक कायम है।
प्लेटफार्म ही नही यहॉ
इस ट्रेक में रेलवे स्टेशनो की स्थिति का आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि किसी भी स्टेशन में प्लेटफार्म नही दिखाई पड़ता है। इतना ही नही यात्रियो को ट्रेन चढ़ते समय या किसी कारण लगी चोट आदि  के लिए किसी भी प्रकार की मेडिकल सहायता किसी भी स्टेशन में उपलब्ध ही नहीं है। जबकि मेडिकल सहायता होना किसी भी स्टेशन की प्राथमिक जिम्मेदारी में होती है। 
क्यों खड़ी हो जाती है ट्रेन पटियारा और उन्नाव के मध्य
एक लम्बे अरसे से अधिंकाशतया ट्रेन पटियारा रेलवे स्टेशन छोड़ते ही उन्नाव के आउटर के पास खड़ी हो जाती है। यदि दैनिक यात्रियो की माने तो ऐसा इस गाड़ी के साथ रोज की बात है। कभी कभी तो एक घण्टे तक खड़ी हो जाती है।
सिंगल ट्रेक मे दी प्रमुखता मालगाड़ियों कों 
इस ट्रेक में रेलवे यातायात पर नजर डाले तो प्रमुखतः मालगाड़ियों की चहलकदमी दिखने वाले ट्रेक को दुरस्त भी तब किया गया। जब कुछ मालगाड़ियों के पहिए रेलवे ट्रेक के टूटने से रूक गए थे। जिससे यह सिंगल ट्रेक बाधित हो गया था।
क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि भी कम दोषी नहीं 
एक बड़े क्षेत्र को प्रभावित करते इस रूट की दूर्दशा को लेकर जनप्रतिनिधियों ने खामोशी अख्तियार कर ली है। इस विषय को लेकर कोई भी बात करने को तैयार नहीं दिखता। उन्नाव के पूर्व सांसद जियाउर्रहमान अंसारी के बाद इस रूट को लेकर किसी ने किसी भी प्रकार की सक्रियता नहीं दिखाई। 

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