साम्प्रदायिक एकता के प्रतीक अग्नि मेला के आयोजन में पड़ सकता है संकट जाने क्यों...............
- श्री खंडेराव मंदिर पर प्रतिवर्ष लगता है अग्नि मेला
- 10 दिनों तक चलेगा यह अग्नि मेला दूर-दूर से पहुंचेंगे हजारों श्रद्धालु
- मन्नत पूरी होने पर आग के अंगारों पर नंगे पैर निकले श्रद्धालु
देवरी कलाँ। अग्नि मेला सागर जिले का सर्वाधिक मशहूर मेला माना जाता है। यह सागर नरसिंहपुर मार्ग पर देवरी में लगता है। यह मेला प्राचीनतम व भव्य मंदिर पर लगने वाला सांप्रदायिक एकता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन अब मेले के आयोजन में संकट चा सकता है। कारण और कुछ नहीं जगह की कमी आयोजकों बताई है।
''आखिर आयोजकों को ,मेला आयोजन में क्यों जगह की समस्या आ पड़ी है, इससे पहले मेले से रूबरू होते हैं''.......
सागर नरसिंहपुर मार्ग पर देवरी में प्रतिवर्ष अगहन शुक्ल पक्ष में परमा से पूर्णिमा तक नवंबर दिसंबर में मेला लगता है। इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। यहां श्रद्धालुओं की मन्नत पूरी होने पर नंगे पैर आग के अंगारो पर से चलते हैं यह परंपरा बहुत पुरानी है। कहां जाता है, राजा यशवंतराव जी के इकलौते पुत्र किसी अज्ञात बीमारी से ग्रसित होकर मरण स्थिति में थे। तब राजा यशवंतराव द्वारा देव श्री खंडेराव जी से प्रार्थना कर कहा गया कि आप का दिया हुआ यह पुत्र है। इसकी रक्षा करें उसी रात राजा यशवंतराव को श्री देव ने दर्शन देकर कहा कि तुम मेरे मंदिर में जाकर हल्दी के उल्टे हाथ लगा कर प्रार्थना करो कि मेरा पुत्र ठीक हो जाए ओर नाव की आकृति के गड्ढे मैं लकड़ी डालकर जला कर विधि-विधान से पूजा कर ठीक 12 बजे नंगे पैर चलना ओर प्रथना करना की मेरा बेटा ठीक हो जावे। यह करने के बाद श्री देव ने उनकी प्रार्थना सुनी ओर राजा का पुत्र ठीक हो गया। तब से यह प्रथा प्रारंभ है जो आज तक चली आ रही है मंदिर के निर्माण की एक बड़ी अनोखी विशेषता है। कि मंदिर में बने दक्षिण तरफ से सूर्य की रोशनी मंदिर के अंदर पिंडी पर ठीक 12:00 बजे पड़ती है तभी तो श्रद्धालु नंगे पैर आग के अंगारे पर निकलते हैं यह दर्शनीय होता है।
महाराष्ट्र के देव बुंदेलखंड मे
यूं तो श्रद्धालुओं की संख्या बड़े स्तर पर स्थानीय के साथ साथ अन्य प्रांतो में से आती है। लेकिन विशेष तौर पर श्री देव के उपासक महाराष्ट्र प्रांत में अधिक हैं। महाराष्ट्र में बहुत लोगो के कुल देवताओं के रूप में पूजे जाते हैं, बुंदेलखंड में एक मात्र श्री देव का सागर जिले की देवरी में मंदिर स्थापित है। इसके अलावा एक मंदिर बिलासपुर छत्तीसगढ़ में छोटे-छोटे मंदिर जबलपुर में श्रीमंत लोककार जी महाराज के राजवाड़े में श्री देव विराजमान है शिर्डी में खंडोबा मंदिर है औरंगाबाद महाराष्ट्र राज्य में बहुत जगह मंदिर स्थापित हैं ।
श्रीदेव का मंदिर सांप्रदायिक सद्भावना का केंद्र
आज यह मंदिर सांप्रदायिक सद्भावना का केंद्र बना हुआ है। क्योंकि श्रीदेव के आगे हाथ फैलाने वाले हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सब की मनोकामना पूरी होती है और हर वर्ग के भक्त मनोकामना पूरी होने पर नंगे पै आग पर चलते हैं यहां ना हिंदू- मुस्लिम सिख ईसाई ना हरिजन - ब्राह्मण सभी देव का विधि-विधान से पूजा अर्चना करते हैं व अपनी मन्नत पूरी होने पर नंगे पैर चलते हैं। यहां श्री देव के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु का जनसैलाब उमड़ता है। यह मेला पहले पांच दिन का होता था श्रद्धालुओं की संख्या अधिक होने से यह मेला अब पांच दिनों से बढ़ कर दस दिन के लिए चलने लगा।
मेले पर संकट छाया आखिर क्यों-----------
भविष्य में जगह की कमी से इस मेले पर संकट आ सकता है । हमारे संवाददाता ने मंदिर के प्रधान पुजारी से बातचीत की तो प्रधान पुजारी ने बताया कि मेले के लिए जगह की बहुत कमी होने लगी है। मंदिर की जगह पर कई लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है तथा आस पास खाली पड़ी जगह पर मकान बन गये है। यदि यही स्थिति रही तो कुछ समय बाद मेले के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा तथा यह ऐतिहासिक मेला नाम मात्र का मेला रह जाएगा ।अतः शासन प्रशासन को ध्यान देना चाहिए कि इस ऐतिहासिक मेले को जगह की आवश्यकता है जिस से मेले का अस्तित्व कायम रखने में मदद मिल सके है हमारे जनप्रतिनिधि ओर शासन के उच्च अधिकारी इस ओर ध्यान दें, तब ही कुछ संभव है ।

No comments