वट पूजन कर मांगा अटल सौभाग्य का वरदान
उन्नाव। सुहागिनों ने मंगलवार को परंपरागत रूप से विधिविधान पूर्वक वट सावित्री पूजन कर अटल सौभाग्य का वरदान मांगा। वट सावित्री पूजन के लिए सुबह से ही वटवृक्षों के नीचे सुहागिनों की लंबी कतार लगी रही। पहलीबार पूजन करने वाली सुहागिनों में गजब का उत्साह रहा। पूरे जिले में वटसावित्री पूजन श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया।
मान्यता के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा के लिए वटवृक्ष के नीचे ही पति का शव रख वटवृक्ष पूजन किया। और उसके बाद पति के प्राण लेकर यमराज जाने लगे तो पतिव्रत धारी सावित्री उनके पीछे -पीछे चल दी । सावित्री के पतिव्रता धर्म के आगे बेबस यमराज ने उनसे वरदान मांगने को कहा। इस पर सावित्री ने यमराज से कहा पहला वरादान सास-ससुर को नेत्रज्योति देने और दूसरा वरदान पुत्रवती होने का मांगा। यमराज तथास्तु कह सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री उनके पीछे-पीछे जल दी यमराज ने मुड़कर देखा वरदान देने के बाद भी सावित्री पीछे आ रही है तो उन्होंने पुनः पूछा अब क्या तो सावित्री ने पति को आप ले जा रहे हैं तो मै पुत्रवती कैसे होऊंगी। यह सुन यमराज को गलती का एहसास हुआ और उन्होंने सत्यावान के प्राण वापस कर दिए। ऐसी मान्यता है कि सावित्री ने वटवृक्ष के नीचे ही पति का शव रख पूजन कर उनके प्राणों को वापस पाया था इससे ही वटसावित्री पूजन किया जाता है।
वट सावित्री व्रत को सौभाग्य देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायक व्रत माना गया है। इस व्रत की तिथि को लेकर भिन्न मत हैं। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है। वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा और सावित्री-सत्यवान की कथा के विधान की वजह से यह व्रत वट सावित्री के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि वट देव वृक्ष है। इसके मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्र भाग में भगवान शिव रहते हैं। देवी सावित्री भी वट वृक्ष में प्रतिष्ठित रहती हैं। इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म से मृत पति को फिर से जीवित कराया था। तभी से पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री व्रत रखा जाता है। वट सावित्री पूजन के लिए सुहागिनों ने उपवास रखकर विधिविधान पूर्वक बरगद पूजन किया। पतियों की दीर्घायु के लिए महिलाओं ने सूत से तने को लपेट फेरी लगाई। इसके बाद हलवा, पूड़ी, आटा के बने बरगद व खरबूजा चढ़ाकर चढ़ाकर सुहागिनों ने पूजन कर पति की लंबी उम्र की कामना की। पूजा अर्चना के बाद प्रसाद ग्रहण कर सुहागिनों ने उपवास तोड़ा। पहलीबार पूजन करने वाली सुहागिनों में गजब का उत्साह देखने को मिला वह सास, ननद, जेठानी आदि से पूछ कर पूजन कर रहीं थी। पूरे जिले में यह पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। सुबह से लेकर दोपहर तक वटवृक्षों के नीचे पूजा अर्चना के लिए सुहागिनों की भीड़ लगी रही।
दो कारों की टक्कर में तीन गंभीर
http://www.thepenpalnews.in/2018/05/unnao-accident-alcohal-drink.html
मान्यता के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा के लिए वटवृक्ष के नीचे ही पति का शव रख वटवृक्ष पूजन किया। और उसके बाद पति के प्राण लेकर यमराज जाने लगे तो पतिव्रत धारी सावित्री उनके पीछे -पीछे चल दी । सावित्री के पतिव्रता धर्म के आगे बेबस यमराज ने उनसे वरदान मांगने को कहा। इस पर सावित्री ने यमराज से कहा पहला वरादान सास-ससुर को नेत्रज्योति देने और दूसरा वरदान पुत्रवती होने का मांगा। यमराज तथास्तु कह सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री उनके पीछे-पीछे जल दी यमराज ने मुड़कर देखा वरदान देने के बाद भी सावित्री पीछे आ रही है तो उन्होंने पुनः पूछा अब क्या तो सावित्री ने पति को आप ले जा रहे हैं तो मै पुत्रवती कैसे होऊंगी। यह सुन यमराज को गलती का एहसास हुआ और उन्होंने सत्यावान के प्राण वापस कर दिए। ऐसी मान्यता है कि सावित्री ने वटवृक्ष के नीचे ही पति का शव रख पूजन कर उनके प्राणों को वापस पाया था इससे ही वटसावित्री पूजन किया जाता है।
वट सावित्री व्रत को सौभाग्य देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायक व्रत माना गया है। इस व्रत की तिथि को लेकर भिन्न मत हैं। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है। वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा और सावित्री-सत्यवान की कथा के विधान की वजह से यह व्रत वट सावित्री के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि वट देव वृक्ष है। इसके मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्र भाग में भगवान शिव रहते हैं। देवी सावित्री भी वट वृक्ष में प्रतिष्ठित रहती हैं। इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म से मृत पति को फिर से जीवित कराया था। तभी से पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री व्रत रखा जाता है। वट सावित्री पूजन के लिए सुहागिनों ने उपवास रखकर विधिविधान पूर्वक बरगद पूजन किया। पतियों की दीर्घायु के लिए महिलाओं ने सूत से तने को लपेट फेरी लगाई। इसके बाद हलवा, पूड़ी, आटा के बने बरगद व खरबूजा चढ़ाकर चढ़ाकर सुहागिनों ने पूजन कर पति की लंबी उम्र की कामना की। पूजा अर्चना के बाद प्रसाद ग्रहण कर सुहागिनों ने उपवास तोड़ा। पहलीबार पूजन करने वाली सुहागिनों में गजब का उत्साह देखने को मिला वह सास, ननद, जेठानी आदि से पूछ कर पूजन कर रहीं थी। पूरे जिले में यह पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। सुबह से लेकर दोपहर तक वटवृक्षों के नीचे पूजा अर्चना के लिए सुहागिनों की भीड़ लगी रही।
दो कारों की टक्कर में तीन गंभीर
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