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श्रद्धा के साथ तपस्या, कटिबद्धता, अनुशासन व समर्पण का प्रतीक कांवड़ यात्रा




डेस्क। कांवड़ यात्रा श्रद्धा के साथ-साथ तपस्या, कटिबद्धता, अनुशासन व समर्पण का भी प्रतीक है। शहर से होकर गुजर रही इस यात्रा में अलग-अलग रंग देखने को मिल रहे हैं। कई श्रवण कुमार, हरिद्वार से कांवड़ में गंगाजल लेकर चले हैं। कोई अपनी मां को कांवड़ में बिठाकर बेहद कठिन यात्रा तय कर रहा है, तो कोई  दादा-दादी को कांवड़ में बिठाए नजर आ रहा है। देखने वाले इन कांवड़ियों की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे हैं। इनके साथ सेल्फी लेने को आतुर हैं। ऐसे भोलों का कहना है कि उनके जीवन में माता-पिता और बुजुर्गो से बढ़कर कोई नहीं है।
मां को कांवड़ में बिठाया  
परतापुर का सतेंद्र हरिद्वार से कांवड़ लेकर चला है। उसने एक ओर अपनी 60 वर्षीय बूढ़ी मां रोशनी को बैठा रखा है तो दूसरी ओर जल है। भैसाली बस स्टैंड के पास से जाते समय लोगों ने सतेंद्र के जज्बे और मां के प्रति प्रेमभाव की खूब प्रशंसा की। 

दादा-दादी को कांवड़ में बिठाकर ला रहा श्रवण कुमार
कंकरखेड़ा के जंगेठी गाव निवासी ब्लेड कंपनी में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर राहुल अपने दादा और दादी को कांवड़ में बिठाकर हरिद्वार से चला है। राहुल के साथ उसके पिता कमल सिंह भी  मौजूद हैं। कांवड़ के एक पलड़े में राहुल के दादा 90 वर्षीय छोटेलाल और दूसरे पलड़े में दादी 80 वर्षीय कश्मीरी बैठी हैं। कावड़ में करीब 135 किलो वजन है। इस कांवड़ में एक ही परिवार की तीन पीढि़यों का दृश्य भी देखने को मिला। मोदीपुरम हाईवे पर कांवड़ को देखने भारी भीड़ उमड़ गई। इस दौरान खूब लोगों ने सेल्फी भी ली। 

साभार - जनता की आवाज

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